Tuesday, June 26, 2018

Kanakdhara stotra

कनकधारा स्तोत्रम् (Kanakadhara Stotram)




जैसे भ्रमरी अधखिले पुष्पों से अलंकृत तमाल-वृक्ष का आश्रय लेती है, 
उसी प्रकार जो दृष्टि श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर 
पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, 
संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का 
वह कृपादृष्टि मेरे लिए मंगलदायी हो    ।1।

जैसे भ्रमरी कमल दल पर मंडराती रहती है, 
उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर
 प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है।
 समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर दृष्टिमुझे धन संपत्ति प्रदान करें     ।।2।।
 
जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, 
उन मुरारी श्रीहरि को भी आनंदित करने वाली है तथा जो 
नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, 
उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ
 पर भी अवश्य पड़े    ।।3।।

शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र 
हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, 
जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, 
किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद
 श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं    ।।4।।

जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल
 में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके 
भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, 
वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कृपादृष्टि मेरा कल्याण करें।।5।।

जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार 
जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के समान श्याम वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है,
 जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, 
 उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण करें     ।।6।

समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि,
 जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन 
के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था,  वही दृष्टि मुझ पर भी पड़े।।7।।

भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी 
मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म 
(धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी घाम को चिरकाल 
के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य 
ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें    ।8।

विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया
 दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, 
पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान 
कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें    ।9।

जो सृष्टि रचना के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में 
विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) 
अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में स्थित होती है,
 त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना 
प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है    ।10।
 
हे देवी । शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है।
 रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है।
 कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार
 है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है    ।11।
 
कमल के समान कमला देवी को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता 
श्रीदेवी को नमस्कार है।
 चंद्रमा और सुधा की सहोदरी बहन को नमस्कार है। 
भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।।
 
कमल के समान नेत्रों वाली हे मातेश्वरी ! 
आप सम्पतिव सम्पुर्ण इंद्रियों को आनंद प्रदान देने वाली हो,
 , साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा हर लेती 
 होमुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे  ।।13।।


जिनकी कृपा दृष्टि के लिए की गई उपासना उपासक 
के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है,
 श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, 
वाणी और शरीर से भजन करता हूं  ।।14।।
  
हे विष्णु प्रिये! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, 
तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। 
तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र,
 गंध और माला आदि से सुशोभित हो। 
तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। 
त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ  ।15।

दिशाओं द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए
 आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर 
जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, 
संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और
 क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं   |16।



कमल के समान नेत्र वाले भगवन केशव की कामिनी पत्नि हे कमले!
 मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, 
तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। आप मुझ पर कृपा दृष्टि करें ।।17।।
 


जो लोग इस प्रकार प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा
 त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं,
 वे इस लोकमें महान गुणवान और अत्यंत भाग्यवान.
 होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं        ।।18।।
 
॥श्रीमदाध्यशङ्कराचार्यविरचितं श्री कनकधारा स्तोत्रम् समाप्तम्॥






kanakdhara Stotra without meaning

कनकधारास्तोत्रम् 

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गळदेवतायाः ॥ १॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ २॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दं
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ३॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ४॥

कालाम्बुदाळिललितोरसि कैटभारेः
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ५॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावान्-
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ६॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षं
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध-
मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ७॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ८॥

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ९॥

धीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति   var  गरुडध्वजभामिनीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२॥

नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै
नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३॥

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै
नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४॥

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै
नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै
नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५॥

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।  var  सरोरुहाणि
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १६॥

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवळतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८॥

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १९॥

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ २०॥

देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातः
कल्यानगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे ।
दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं मां
आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः ॥ २१॥

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ २२॥

॥ इति श्रीमद् शङ्कराचार्यकृत
श्री कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अयं स्तवः स्वामिना शङ्करभगवत्पादेन ब्रह्मव्रतस्थेन कालटिनाम्नि
स्वग्राम एवाकिञ्चन्यपरिखिन्नाया द्विजगृहिण्या 
निर्धनत्वमार्जनाय  निरमायि । 
तेन स्तवेन प्रीता लक्ष्मीर्विप्रं विपुलधनदानेनाप्रीणयदिति
शञ्करविजयतः समाधिगम्यते, 
``स मुनिर्मुरजित्कुटुम्बिनीं
पदचित्रैर्नवनीत कोमलैः ंअधुरैरूपतस्थिवां- स्तवैः''
इत्यादिना ॥ 
एते श्रीमन्मातुरभ्यर्थनया स्तवमेतमतनिषतेति
कालटिग्रामनिकटवर्तिनां विदुषां मतम् ।
 तदारभ्य कर्णाकर्णिकया
तथानुश्रुतम् ।